नारायण को एकादशी का व्रत अत्यंत प्रिय: कृषणप्रिया

हरिपथ:लोरमी– 14 नवम्बर नगर में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के पंचम दिवस में संत कृष्णप्रिया ने कहा कि “जहां पर भागवत कथा होती है वहां पर उस समय सारे तीर्थ, सारी नदियां, सारे देवता विचरण करते हैं।

श्रीमद् भागवत कथा कल्पतरू की तरह है जिसकी शरण में बैठने पर हमारी सारी मनोकामनाएं भागवत कथा पूर्ण करती है।भागवत कथा में जो व्यक्ति जिस मंशा के साथ बैठता है, उसकी सारी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं लेकिन व्यक्ति की भावना पवित्र हो और संसार के मंगल की कामना उसके मन में हो। ऐसे व्यक्ति की मनोकामना भागवत कथा से पूर्ण होती है।”


श्रीमद्भागवत कथा के प्रसंग को आगे बढ़ाते हुए पूज्या दीदीजी ने कहा – “कथा का पंचम दिवस अत्यधिक मनोहर होता है। क्योंकि इसमें नटखट बाल कृष्ण की लीलाओं का श्रवनपान कराया जाता है। नटखट बाल स्वरूप की लीलाओं का बहुत ही सुंदर दर्शन कराते हुए बताया कि भगवान कृष्ण साक्षात परमब्रह्म हैं वे अजन्मे हैं ईश्वर केवल भक्तों के लिए ही धरती पर अवतरित होकर अनेको लीलाएँ करते हैं जिससे भक्ति में रस और भाव की उत्त्पति हो। साथ ही उनकी प्रत्येक लीला के पीछे एक विशेष संदेश छिपा होता है। भगवान कृष्ण के जन्म पर पूरी गोकुल नगरी मानो स्वर्ग बन गयी थी। सभी देवतागण, देवियां सच्चिदानंद भगवान के बालस्वरूप को देखने आते हैं और महा महोत्सव होता है।” भगवान कृष्ण का अवतार पूर्ण ब्रह्म का है इसलिए उन्होंने बाल्यावस्था से ही कंस द्वारा भेजे गए भयानक राक्षसों का संहार किया। आगे पूतना वध की कथा सुनाते हुए कहा कि – “भले ही पूतना राक्षसी थी और कृष्ण को मारने के उद्देश्य से ब्रज में आई थी लेकिन भगवान अत्यंत दयालु हैं और उसे वह गति प्रदान की जो कि बड़े बड़े साधु, संतो को भी नहीं मिल पाती।” कथा में भगवान श्री कृष्ण की मनोरम झांकी का अवलोकन कराया गया। कथा व्यास ने कृष्ण जन्म कथा के बाद कथा को आगे बढ़ाते हुए पूतना वध, यशोदा मां के साथ बालपन की शरारतें, भगवान श्रीकृष्ण का गो प्रेम, कालिया नाग मान मर्दन, चीर हरण, माखन चोरी गोपियों का प्रसंग सहित अन्य कई लुभावने प्रसंगों का कथा के दौरान वर्णन किया।जिसमें उन्होंने श्री कृष्ण से संस्कार की सीख लेने की बात कही। उन्होंने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण स्वयं जानते थे कि वह परमात्मा हैं उसके बाद भी वह अपने माता पिता के चरणों को प्रणाम करने में कभी संकोच नहीं करते थे। यह सीख में भगवान श्रीकृष्ण से सभी को लेनी चाहिए। श्रीमद् भागवत कथा के दौरान कथा व्यास द्वारा बीच-बीच में सुनाए गए भजन पर श्रोता भाव विभोर हो गए।

देवी जी ने बताया कि नारायण को एकादशी का व्रत अत्यंत प्रिय है। और सभी व्रत किसी न किसी कामना वश किये जाते हैं एकमात्र एकादशी का वृत प्रभु की प्राप्ति कराने वाला है। प्रत्येक सनातनी को ये व्रत अवश्य करना चाहिए और इसकी नियम विधियों का भी पालन करना चाहिए।।
ईश्वर की भक्ति द्वारा देह को आसानी से मथुरा बनाया जा सकता है। जब मन भगवान के चिंतन में पूर्णतया लगता है तब वह गोकुल बन जाता है और कृष्ण की ह्रदय में उत्पत्ति होती है। इसलिए प्रतिदिन प्रातः काल सबसे पहले ईश्वर का स्मरण करना चाहिए जिससे पूरा दिन व जीवन खुशहाली से भर जाए क्योंकि जब मन पवित्र रहेगा तो कोई विकार आपको स्पर्श नही कर सकता।

देवी जी ने बताया कि बहुत छोटी आयु में ही श्रीकृष्ण गाय चराने की जिद करते हैं। भारतीय संस्कृति की व्याख्या संक्षेप में करनी हो तो वह गो रूप है। गो प्रेम के कारण ही हमारे देश में गोकुल, गोवर्धन और गोपाल जैसे नाम प्रचलित हैं। गो की रक्षा के लिए स्वयं परमात्मा इस धरती पर आते हैं लेकिन उनकी संतान इस सेवा से आज क्यों वंचित है।भारत की संपन्नता गाय के साथ ही जुड़ी हुई है। बड़े दुख की बात है कि देश में पूजा योग्य गाय की हालात दयनीय हो गई है। देश के विभाजन से पहले देश में केवल 300 बूचड़खाने थे परंतु आज देश में इनकी संख्या हजारों हो चुकी है। आज देश में कानूनी और गैर कानूनी तौर पर हजारों बूचड़खाने चल रहे हैं। हमें गौरक्षा हेतु कठोर कदम आगे बढ़ाने चाहिए। आपको बता दें कथाव्यास देवी कृष्णप्रिया जी गौरक्षा व गौसेवा के लिए सदैव तत्पर रहतीं हैं और उनके द्वारा संचालित चैन बिहारी आश्रय फाउंडेशन निर्णय 15 वर्ष से महावन मथुरा में गौशाला संचालित है। बचपन में सड़क दुर्घटना में घायल गौमाता को देखकर उन्हें अत्यंत दुख हुआ लेकिन कोई भी गौमाता मदद के लिए आया। तब देवी जी ने सर्वप्रथम गौमाता का उपचार कराया उसके बाद से उन्होंने गौसेवा का संकल्प ले लिया और आज गौशाला में 300 से अधिक गौवंश की देखभाल करतीं हैं। आपने एक हजार गौमाता के निवास हेतु विशाल गौशाला निमार्ण का निश्चय किया जो कि निर्माणाधीन हैं। देवी जी ने कथा के माध्यम से अनुरोध किया कि – ” गौमाता को अवश्य पालें, उनको रोटी खिलाये, उनकी सेवा करें। अन्यथा किसी गौशाला से जुड़कर गौरक्षा में अपना योगदान दें.. गौमाता में 33 कोटि देवताओं का वास है। इनकी सेवा से जीवन मे सौभाग्य और सुख आता है साथ पंचगव्य का सेवन करके असाध्य रोगों से भी छुटकारा पाया जा सकता है। इसलिए हमें गो सेवा अवश्य करनी चाहिए।”


कलियुग की महिमा बताते हुए कहा भागवत कथा विचार, वैराग्य, ज्ञान और हरि से मिलने का मार्ग बता देती है। कलयुग में मानस पुण्य तो सिद्ध होते हैं। परंतु मानस पाप नहीं होते। कलयुग में हरी नाम से ही जीव का कल्याण हो जाता है। कलयुग में ईश्वर का नाम ही काफी है सच्चे हृदय से हरि नाम के सुमिरन मात्र से कल्याण संभव है। इसके लिए कठिन तपस्या और यज्ञ आदि करने की आवश्यकता नहीं है। जबकि सतयुग, द्वापर और त्रेता युग में ऐसा नहीं था। इससे पहले कृषणप्रिया ने ग्राम गौरकापा में विवेक गिरी महराज से सौजन्य भेंटकर गौशाला में गौ माता पुजा अर्चना किये।



