अचानकमारछत्तीसगढ़न्यूजलोरमीवनविभागवनांचलविरासतविशेष खबर

वनांचल के विश्राम गृह बने विरासत: बीहड़ों में अंग्रेजों ने बसाई थी, आरामगाह! 1911 में  2573 रुपये में बना था डाक बंगला..

हरिपथ:लोरमी-14 जून(विशेष खबर)अचानकमार टाइगर रिजर्व क्षेत्र के घने जंगलों में स्थित ब्रिटिशकालीन विश्राम गृह आज भी अपनी मजबूती, वास्तुकला और ऐतिहासिक महत्व के कारण लोगों को आकर्षित करते हैं। सौ वर्ष से अधिक पुराने ये विश्राम गृह केवल भवन नहीं, बल्कि वनांचल की सांस्कृतिक एवं स्थापत्य विरासत के जीवंत प्रतीक हैं।

ब्रिटिश शासनकाल में अधिकारियों एवं वन प्रबंधन से जुड़े कर्मचारियों के ठहरने के लिए जंगलों के बीच ऐसे विश्राम गृहों का निर्माण कराया गया था। इन भवनों को मुख्य सड़कों से दूर शांत एवं एकांत स्थानों पर बनाया जाता था,ताकि बाहरी हस्तक्षेप, शोर-शराबे और भीड़भाड़ से दूर रहकर अधिकारी प्राकृतिक वातावरण में विश्राम कर सकें।

अचानकमार का ब्रिटिशकालीन विश्रामगृह

अचानकमार, छपरवा, लमनी, कारिडोंगरी, सुरही और औरापानी में स्थित अधिकांश विश्राम गृह एक जैसी वास्तुशिल्प शैली में निर्मित हैं। इन भवनों में उस दौर की पारंपरिक वातानुकूलन व्यवस्था देखने को मिलती है। कमरों में बड़े कपड़े के पर्देनुमा पंखे लगाए जाते थे, जिन्हें बाहर बैठा सेवादार रस्सी के माध्यम से खींचकर संचालित करता था। इससे कमरे में संतुलित एवं ठंडी हवा का प्रवाह बना रहता था।

शीतकाल में ठंड से बचाव के लिए कमरों में आग जलाकर ताप व्यवस्था भी की जाती थी। उस समय आधुनिक सुविधाएं नहीं होने के बावजूद इन विश्राम गृहों में घर जैसी आरामदायक व्यवस्था उपलब्ध कराई गई थी।

1911 में मात्र 2573 रुपये में बना था डाक बंगला-अचानकमार टाइगर रिजर्व क्षेत्र का एक डाक बंगला वर्ष 1911 में केवल 2573 रुपये की लागत से निर्मित हुआ था। आज के समय में यह राशि भले ही सामान्य प्रतीत हो, लेकिन उस दौर में इसकी क्रय शक्ति अत्यंत अधिक थी। यही कारण है कि इतने सीमित खर्च में बने ये भवन आज भी मजबूती के साथ खड़े हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार, उस समय निर्माण कार्य में उच्च गुणवत्ता वाली सामग्री और पारंपरिक तकनीकों का उपयोग किया जाता था। परिणामस्वरूप एक सदी से अधिक समय बीत जाने के बाद भी अधिकांश भवनों की दीवारों एवं संरचना में कोई विशेष कमजोरी दिखाई नहीं देती।

टाइगर रिजर्व बनने के बाद प्रतिबंधित हुई गतिविधियां-अचानकमार क्षेत्र को टाइगर रिजर्व घोषित किए जाने के बाद इन विश्राम गृहों में आम पर्यटकों और सैलानियों की गतिविधियों पर प्रतिबंध लगा दिया गया। वर्तमान में इनका उपयोग सीमित प्रशासनिक एवं वन विभागीय कार्यों तक ही रह गया है।

संरक्षण की जरूरत-सामान्य वनक्षेत्र के औरापानी एवं कारिडोंगरी के विश्राम गृहों का वन विभाग समय-समय पर मरम्मत एवं रखरखाव करता रहा है। औरापानी जर्जर अवस्था पर है,वही कारिडोंगरी रिनवल कार्य जारी है।कारिडोंगरी का विश्राम गृह वर्ष 1947 में निर्मित हुआ था, जहां वर्तमान में नवीनीकरण कार्य भी प्रारंभ है।

स्थानीय इतिहास प्रेमियों एवं पर्यावरणविदों का मानना है कि इन विश्राम गृहों को केवल सरकारी भवन के रूप में नहीं, बल्कि सांस्कृतिक धरोहर और विरासत स्थल के रूप में विकसित किया जाना चाहिए। इससे आने वाली पीढ़ियों को वनांचल के इतिहास, ब्रिटिशकालीन वास्तुकला और उस दौर की जीवनशैली को समझने का अवसर मिलेगा।

विरासत संरक्षण की मांग– क्षेत्र के लोगों का कहना है कि अचानकमार, लमनी, छपरवा, सुरही, कारिडोंगरी और औरापानी के ऐतिहासिक विश्राम गृहों का दस्तावेजीकरण कर इन्हें हेरिटेज श्रेणी में शामिल किया जाना चाहिए। उचित संरक्षण एवं संवर्धन के माध्यम से ये भवन छत्तीसगढ़ की ऐतिहासिक पहचान और पर्यटन विकास का महत्वपूर्ण केंद्र बन सकते हैं।

अचानकमार के सरपंच मीना देवी अंनत ने कहा की स्थानीय  विश्राम गृह में सरकार सैलानियों के लिए स्थानीय सरपंचों अथवा महिला समूहों देना चाहिए ताकि रोजगार सृजन एवं आवश्यक देखभाल कर विरासत को संजोया जा सके। 

डीएफओ मुंगेली सामान्य वनक्षेत्र अभिनव कुमार ने कहा कि एटीआर के कोर जोन क्षेत्र में सुप्रीम कोर्ट ने सैलानियों के लिए प्रतिबंध लगाया हुआ है। सामान्य वनक्षेत्र के ब्रिटिशकालीन  कारोडोंगरी विश्राम गृह रिनवल कार्य जारी है। औरापानी के रेस्ट हाउस जर्जर अवस्था है। जिसे स्थानीय विधायक एवं डिप्टीसीएम अरुण साव के माध्यम से विभागीय उच्च अधिकारियों को पत्र प्रेषित किया गया है। स्वीकृति के पश्चात रिनवल कार्य प्रारंभ होगा। अभी सामान्य वनक्षेत्र के विश्राम गृह का शासकीय दर निर्धारित नही हुआ है,विभागीय आदेश के बाद सैलानियों के लिए खोल दिये जायेंगे। 

Latest