शरद पूर्णिमा की मध्यरात खीर प्रसाद ग्रहण करने उमड़ी भीड़…विधायक देवेंद्र,अटल ने स्वामी जी से लिया आशीर्वाद

हरिपथ;बेलगहना, 26 अक्टूबर। मैकल-विंध्य की सुरम्य पहाड़ियों के मध्य स्थित श्री सिद्धबाबा अद्वैत परमहंस आश्रम, में रविवार को 73 वर्षों से चली आ रही शरद पूर्णिमा महोत्सव की पावन परंपरा श्रद्धा, भक्ति एवं आध्यात्मिक उल्लास के साथ मनाई गई। सद्गुरुदेव स्वामी सदानंद महाराज द्वारा स्थापित इस गौरवशाली परंपरा का स्वामी शिवानंद महाराज के पावन सानिध्य में सहज रूप से निर्वहन किया जा रहा है। शरद पूर्णिमा की निर्मल चाँदनी जब खनिज संपदा से समृद्ध इस पहाड़ी क्षेत्र पर बिखरी, तब अभ्रक की चमक से आश्रम परिसर ऐसा दमक उठा, मानो प्रकृति ने स्वयं चाँदी की आभा से उसे सुसज्जित कर दिया हो। चंद्रमा की शीतल चाँदनी, पहाड़ियों की प्राकृतिक छटा और आश्रम का दिव्य वातावरण श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र बना रहा।

महोत्सव का मुख्य आकर्षण श्री सिद्धबाबा जी महाराज के दर्शन रहे। भगवान सद्गुरु के दर्शनार्थ जम्मू-कश्मीर, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, बिहार सहित देश के विभिन्न राज्यों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु भक्त आश्रम पहुँचे। महोत्सव में लगभग 60 से 70 हजार श्रद्धालुओं की उपस्थिति रही, जिससे आश्रम परिसर एवं आसपास का क्षेत्र गुरु-भक्ति और आध्यात्मिक उल्लास से सराबोर हो उठा। दूर-दराज से पधारे श्रद्धालुओं ने श्री सिद्धबाबा जी महाराज के दर्शन कर अपनी श्रद्धा अर्पित की और दिव्य सानिध्य में आध्यात्मिक आनंद की अनुभूति प्राप्त की।

इस पावन अवसर पर क्षेत्रीय कोटा विधायक अटल श्रीवास्तव एवं भिलाई विधायक देवेंद्र यादव ने भी आश्रम पहुँचकर श्री सिद्धबाबा जी महाराज तथा परम श्रद्धेय स्वामी शिवानं महाराज के दर्शन किए। इसके साथ ही बिलासपुर के वरिष्ठ उद्योगपति एवं समाजसेवी प्रवीण झा , विजय केसरवानी ने भी आश्रम पहुँचकर भगवान सद्गुरु के दर्शन किए और श्रद्धाभाव से अपनी आस्था अर्पित की। भगवान सद्गुरु के दिव्य दर्शन कर सभी ने भक्तिभाव एवं आध्यात्मिक आनंद की अनुभूति प्राप्त की। शरद पूर्णिमा की पावन रात्रि में आश्रम की आध्यात्मिक गरिमा, श्रद्धालुओं की आस्था और प्रकृति की अनुपम छटा ने महोत्सव को विशेष गरिमा प्रदान की।
शरद पूर्णिमा का आध्यात्मिक महत्त्व भगवान सद्गुरु के दिव्य स्वरूप एवं गुरु-तत्त्व से अभिन्न रूप से जुड़ा है। जिस प्रकार पूर्ण चंद्रमा अपनी शीतल चाँदनी से संपूर्ण धरा को आलोकित करता है, उसी प्रकार भगवान सद्गुरु की कृपा साधक के अंतःकरण से अज्ञान, अहंकार, राग-द्वेष एवं ईर्ष्या के अंधकार को दूर कर ज्ञान, प्रेम, विवेक और आत्मबोध का प्रकाश जागृत करती है। चंद्रमा की पूर्णता जहाँ प्रकृति को शीतलता प्रदान करती है, वहीं भगवान सद्गुरु का दिव्य सानिध्य मानव जीवन को आंतरिक शांति, आत्मिक निर्मलता और आध्यात्मिक पूर्णता की अनुभूति कराता है। गुरु-तत्त्व की यही दिव्य अनुभूति जीवन को सार्थकता प्रदान करती है।
महोत्सव के अंतर्गत रात्रि 7 बजे शास्त्रीय संगीत का कार्यक्रम आयोजित किया गया। संगीत की सुरमयी प्रस्तुतियों ने आश्रम परिसर को भक्तिरस से सराबोर कर दिया। वहीं, शरद पूर्णिमा की पावन मध्यरात्रि 12 बजे श्रद्धालुओं को खीर प्रसाद वितरित किया गया। श्रद्धालुओं ने प्रसाद ग्रहण कर भक्तिभाव के साथ महोत्सव में सहभागिता की और आध्यात्मिक आनंद की अनुभूति प्राप्त की।


इस अवसर पर प्रथम हॉस्पिटल द्वारा स्वास्थ्य शिविर का आयोजन भी किया गया। शिविर में दूर-दराज के क्षेत्रों से आए अनेक श्रद्धालु भक्तों ने स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ उठाया। इस पहल के माध्यम से श्रद्धालुओं को आवश्यक स्वास्थ्य सुविधाएँ उपलब्ध कराई गईं। महोत्सव के पावन अवसर पर आयोजित यह स्वास्थ्य सेवा मानव सेवा एवं जनकल्याण की भावना को अभिव्यक्त करती रही।
73 वर्षों से अक्षुण्ण चली आ रही यह पावन परंपरा गुरु-निष्ठा, श्रद्धा एवं सनातन आध्यात्मिक चेतना की जीवंत अभिव्यक्ति है। शरद पूर्णिमा महोत्सव का संदेश है कि जीवन की वास्तविक पूर्णता बाहरी वैभव में नहीं, बल्कि भगवान सद्गुरु के प्रति अटूट श्रद्धा, निष्काम समर्पण तथा उनके दिव्य मार्गदर्शन को जीवन में आत्मसात करने में निहित है। जिस प्रकार शरद पूर्णिमा का पूर्ण चंद्रमा अपनी निर्मल चाँदनी से रात्रि को प्रकाशमय कर देता है, उसी प्रकार भगवान सद्गुरु की कृपा से साधक का अंतःकरण प्रकाशित होकर जीवन को ज्ञान, प्रेम, भक्ति और आत्मबोध से परिपूर्ण कर देता है।